क्या जीवन अब भी चलता है? नीता झा।
बच्चियों पर होते अत्याचार न जाने कब थमेंगे? मन बहुत दुखी हो जाता है। जब ऐसी घटनाओं के बाद बहुत से दिल ताउम्र एक भी पल सुख के नहीं बिता पाते होंगे, जिस घर से ऐसी अर्थियां उठती होंगी वहां फिर कभी क्या खुशियां उन्मीक्त नाचती होंगी कभी नहीं। इस घिनौने अपराध को अंजाम देने वालों के दिमाग मे ऐसा क्या चलता होगा? क्या इस अपराध के मूल कारण पर कभी चिंतन होंगे? क्या कभी इन अपराधों पर वास्तव में अंकुश लग पाएगा? ऐसे बहुत से प्रश्न सभी के मन मे उठते हैं। जवाब के न मिलने तक सवाल नासूर की तरह हर इंसान को सालते रहेंगे। "क्या जीवन अब भी चलता है" इन प्रश्नों के दूसरे पहलू को उकेरने का प्रयास है। हम जितनी आस्था भगवान पर रखते हैं उतना ही विश्वास लोक,परलोग, आत्मा, पुनर्जन्म इत्यादि पर भी करते हैं। यह हिन्दू धर्म के साथ समाहित है तभी तो हम श्राद्ध कर्म को इतनी श्रद्धा से सम्पन्न कराते हैं। मेरी यह कविता इन्ही विषयों के इर्दगिर्द धूमती हुई वेदना है क्या जीवन अब भी चलता है! हम सबके न होने के बाद ? घर आंगन कैसे लगते हैं ! हमारी अर्थी उठने के बाद ? गमलों में पानी कौन दे ...