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गुलमोहर यानी स्वर्ग का फूल - नीता झा

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रसोई से आज फिर बर्तनों की आवाज़ आई इस वीराने में भला कौन रोज बर्तनो के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्शाता है कौन हो सकता है? कितनी आवाज़ें देंने पर भी कभी कोई प्रत्युत्तर नहीं आया.... सम्भवतः बिल्ली होगी..... निसन्देह बिल्ली ही है.... बड़ी मुश्किल से उठने की कोशिश करती हुई पलँग से उतरना  चाहा लगभग घिसटती हुई दो कदम चलीं कि बड़े जोरों से चक्कर आया घबरा कर वापस पलँग में लगभग गिरती हुई पड़ गईं।   आंखें नम हो गईं उन्हें पाठक जी की याद हो आई अभी महीना भर भी तो नहीं हुआ है। उन्हें गुज़रे..... परसों मासिक है। इतने भले चंगे खुशमिजाज आदमी उस दिन सुबह सब्जी लेने निकले थे। थैला भरकर सब्जी लाकर खुद ही पानी मे नमक डालकर भिगो दिया और सुलभा जी के आवाज़ देने पर टेबल में सेनेटाइजर की बोतल रखते हुए बोले -" वाह चाय के साथ गर्म पकौड़े..... कुर्सी खींचते हुए बड़े प्यार से अपने पास बिठा कर साथ मे नाश्ता किया। सुलभा जी सिंक में बर्तन रखने गईं कि तभी उन्हें कुछ गिरने की आवाज़ आई पाठक जी को दिल का जबरदस्त दौरा पड़ा था।   एक ही पल में सब कुछ बदल गया था। कोविड टेस्ट हुआ पता भी नहीं चला दोनो...

और सब ठीक हो गया – नीता झा

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कुछ शब्द जो पारे की तरह कानों में पड़ते हैं। जिन्हें सुनना, सहना आसान नहीं होता....  पर किया भी क्या जाए....  कितनो के मुह बन्द करें और किस किस बात पर.... माँ गुस्से में बड़बड़ाती रोटी सेंक रही थी पास ही बैठी लक्ष्मी बर्तन साफ कर रही थी।  क्या हुआ माँ क्यों दुखी हो रही हो? कुछ नहीं लाडो.... बताओ तो... बेटी की पुचकार सुन लाजो का मन भर आया उसने बड़े धीमे से स्वर में बताया-" आज मालकिन के घर साफ सफाई कर रही थी साहब का कोई जरूरी कागज कचरे में डाल दी थी। सब ढूंढ रहे थे जब मैं बताई कचरे में कागज भी था तो मेरेसे निकलवाए और साहब बहुत गुस्सा कर रहे थे। बोले बिना पूछे कोई सामान मत फेका कर वो बता रहे थे। दस हजार का था वो... लेकिन इतना महंगा दिख नहीं रह था... क्या पता क्या था वो भाभी के ऊपर भी बहुत गुस्सा कर रहे थे बोले -" लाजो के लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर है तुम तो देखा करो" मेरे कारण भाभी को भी बहुत सुनना पड़ा। बेटी भैया जो बोले उसका क्या मतलब है? लक्ष्मी ने मुस्कुरा कर अपनी माँ को गले लगाते हुए कहा- इसका मतलब है अब हम दोनों रोज रात में बैठेंगे तुम स्वेटर बनाना सीखाना मैं...

रिश्तों के वेंटिलेटर…..नीता झा - अंतिम भाग

   वीनू से सभी लोगों को बहुत उम्मीद थी। लेकिन कोई कह नहीं रहा था। वो तो कमला दीदी का निश्छल प्रेम था की उन्होंने वीनू को वो तस्वीर दिखाई जो अबतक उसकी नजरों से ओझल थी।         जबसे वीनू आया था दिन में एक दो बार वह रुद्र की पापा से बात करवाता था। सुरु में रुद्र को देखकर पापा बहुत खुश हुए लेकिन उनको देखकर रुद्र सहम गया था। उसके दादाजी तो उसके बेस्ट फ्रेंड हैं जो उसके साथ खेलते हैं, गार्डन में उसे झूला झूलाते हैं। वो हमेशा पंजा लड़ाने में रुद्र से हार जाते हैं लेकिन रुद्र से फ़ास्ट दौड़ते हैं। और वो और दादी मिलकर उसे ड्रॉइंग, अपने देश के यूनिक गेम्स सब सिखाते हैं। पर अभी दादाजी को क्या हो गया ?        मम्मा क्या हम कभी खेल नहीं पाएंगे?        उसकी बातें सुनकर पापा का चेहरा उतर गया था। सब चिंतित हो गए। मम्मी ने बात सम्हाली।   "अरे जूनियर ...दादाजी को ज्यादा कुछ नहीं हुआ है। वो जल्दी ही ठीक हो जाएंगे, तुम्हारे साथ पंजा लड़ाने, तुम पूरी तैयारी से रहना, अब जब भी मिलेंगें दादाजी तुमसे  जीतने की तैयारी कर रहे है...

रिश्तों के वेंटिलेटर.…..." नीता झा - भाग - 7

                           वीनू ने कमला दीदी और मम्मी के साथ मिलकर पूरे घर को व्यवस्थित किया घर में पहले की तरह किराना भी नहीं था। अधिकांश डिब्बे खाली थे। कभी जिन अलमारियों और रैक में  सामान रखने की जगह नहीं होती थी वहां जगह ही जगह थी। वीनू ने कमला दीदी से पूछा -"दीदी सारे डिब्बे खाली पड़े हैं। आपलोगों ने खाना पीना छोड़ दिया क्या?"   कमला दीदी ने मुस्कुरा कर कहा  " गुस्सा क्यों होता है बेटा अब ये बूढ़ों का घर है। खिचड़ी, दलिया का ही समान मिलेगा यहां। अब तू आ गया सब समान ले आएंगे।"     वीनू ने तब ध्यान दिया शायद वो थोड़ा तल्ख़ हो गया था। उसने बात सम्हाली....     " अरे दीदी मेरा वो मतलब नहीं था पर अभी इतने भी बूढ़े नहीं हुए लेकिन मैं मात्र दो साल बाद यहां आ रहा हूँ और लगता है सब बीस साल बड़े हो गए पापा कितने दुबले, कमजोर लग रहे हैं। कबसे कटिंग, कलरिंग नहीं करवाए हैं।"      कुछ रुक कर बोला चलो मान लेते हैं पापा बीमार हैं, पर मम्मी भी यार....     कैसी हो गई हैं। न हेयर क...

"रिश्तों के वेंटिलेटर...... नीता झा भाग - 6

                                                                                   छोटी सी नई नवेली दुल्हन से कब कमला दीदी नाती- पोतों वाली हो गई और कब वो परिवार की सदस्य सी बन गई पता ही नहीं चला, भरा- पूरा परिवार है। खाने- पीने की कोई तकलीफ नहीं, पर एक रिश्ता सा बन गया है। तो चली आता है अब भी काम में।    "एकबार बाढ़ की वजह से कमला दीदी का भाई राखी में नहीं आ पाया....    तब उसने तेरे पापा को जो राखी बांधी आज भी पहली राखी उसी की होती है। बुआ लोग भी उसे बहुत मानते हैं। तभी तो तीजा की साड़ियों में उसकी भी साड़ी होती है। बताते बताते मम्मी अक्सर भावुक हो जातीं।    इतने में कॉलबेल बजी शायद साहू जी होंगे अंकल के क्लिनिक से वीनू ने अंदाज लगाया के फेमिली डॉ. मिश्र से वीनू ने एक अटेंडर रखने की बात कही थी। उन्होंने साहू जी को भिजवाया वह केवल सुबह ही आकर सा...

"रिश्तों के वेंटिलेटर आने लगे दूर देश से" - नीता झा -भाग - 5

                                               "रिश्तों के वेंटिलेटर आने लगे दूर देश से"   -   नीता झा   भाग -5 वीनू के जाते ही कितना सुना पन भर गया था घर में अभी तो वो भारत भी नहीं पहुंचा होगा और इतनी बोरियत लग रही है। वो महीने भर कैसे रहेगी; रुद्र भी पहली बार पापा को छोड़ कर रहने वाला है.. पता नहीं कैसे मैनेज करेगी! पर वीनू का जाना भी तो बहुत जरूरी था।      वीनू को अमेरिका के साथ अपने देश भारत पर भी बड़ा गर्व हुआ जब वह सीधे अमेरिका से अपने घर तक सकुशल पहुंचा जगह - जगह जांच होती रही जिसमे भगवान की कृपा से हर बार रिपोर्ट निगेटिव आई । सावधानी वश उसे कुछ दिन होम आइसोलेशन में रहने की हिदायत दी गई तमाम प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद जब उसने अपने घर की दहलीज में कदम रखा मन भावुक हो गया पापा से कैसे मिलेगा?     अभी तक तो दूर था लेकिन एक ही घर में रह कर वो उनसे नहीं मिल पाएगा.....      कितना अजीब लगेगा पर और को...

"रिश्तों के वेंटिलेटर आने लगे दूर देख से" - नीता झा भाग - 3

                                                                                                              पापा मम्मी चले गए वीनू का घर सुना करके। हर जगह उनकी मौजूदगी का अहसास छोड़ कर खैर... धीरे- धीरे नन्हे रुद्र के साथ दोनों की व्यस्तता बहुत ज्यादा बढ़ गई थी। खुद ही सारा काम करना पड़ता था। अब लगता है वह काफी समय से पापा मम्मी की तरफ उतना ध्यान नहीं दे पा रहा था। जितना देना चाहिए था। कई बार पैसे भेजने में भी देर होने लगी। उन्होंने कभी खुद के लिए वीनू से कुछ नहीं माँगा बस उसी की ज़िद थी पढ़ाई में लिए लोन पटाने के बाद भी वह कुछ पैसे हमेशा भिजवाता रहेगा वीनू की ज़िद का मान रखते थे पर कभी पैसे भिजवाने में देर हुई या नहीं भेजा तो याद भी नहीं दिलाया  और "वो सब ठीक है" का चश्मा लगाए धीरे धीरे अपनी जिम्मेदारियों से विमुख ...

दूर देश से आते रिश्तों के वेंटिलेटर - नीता झा

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"मम्मी कोरियर वाला आएगा, आप तब तक सामने कमरे में पहुंचो... थोड़ी जल्दी चलना मेरी माँ... वो चला न जाए पिछली बार की तरह"   वीनू का फोन आया था लीना का चेहरा उतर गया उसने बुझी अवाज़ में बस इतना ही कहा-" अब क्या भेज रहा है? हमलोगों को कुछ नहीं चाहिए" और मोबाइल मनोज के सीने पर रख कर उठने का उपक्रम करने लगी।   उठते - उठते उसकी आह निकल गई, घुटना बहुत दुख रहा था। सब गाउन भी ढीले हो गए थे उठते-बैठते कभी पैरों में कभी दरवाजे में फंसते रहते वो लगभग घिसटती हुई बाथरूम की तरफ जाते हुए जोर से बोलीं -"मनोज वीनू फिर कुछ भेज रहा है!उससे कह दो, हमे कुछ नहीं चाहिए" और जोर से बाथरूम का दरवाजा बंद किया। वीनू जनता था पापा ने पिछले 6 महीने से कुछ कहा ही नहीं है; उन्हें लकवा जो हुआ है। बात करने के नाम पर कुछ अस्फुट ध्वनि ही बड़ी मुश्किल से निकलती है। शब्द नहीं फिर भी वह उनसे हालचाल पूछता रहा वो कह न सकते हों पर सुनते तो हैं।वीनू उनके आंसुओं को महसूस कर पा रहा था। मोबाइल में घरघराहट की आवाज बढ़ने लगी... शायद पापा बोलने या रोने लगे थे। उसने प्रणाम करके फोन रख दिया।   वह उदास ...

वर्तमान को सँवारें नीता झा

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शैली जल्दी-जल्दी सारे काम निपटा रही थी। कामवाली के बिना पूरे घर का काम सम्हालना बड़ा मुश्किल हो रहा था। वैसे आजकल सभी लोग घर में होते हैं, तो बिना कहे ही सब में काम बंट गया है। सुबह बच्चे मम्मी- पापा के साथ योग वगैरह से फ्री होकर नहा कर पूजा करने लगे हैं। तनु- मनु बड़ी खुशी से अपने दादा- दादी से धर्म- कर्म की बातें सुन समझ रहे हैं। कभी कभी तो उनकी दिलचस्प बातों में शैली सोहम भी मशगूल हो जाते। सुबह की चाय से रात के दूध  तक साथ ही खाते - पीते खुशनुमा समय बिता रहे हैं।    विकट महामारी ने जहां देश समेत पूरी दुनियां में तबाही मचा रखी है वहीं, सबसे सुरक्षित जगह बना घर, रिश्तों को बांधने का भी काम कर रहा है।बड़े दिनों बाद सब इतने लंबे समय तक एक साथ हैं। शैली का परिवार बड़ा ही सुलझा हुआ सुखी, संतुष्ट परिवार है। वहीं शैली ने भी हमेशा सबका मान रखा। कल तनु-मनु के स्कूल से मैसेज आया था,जल्दी ही उनके स्कूल खुलने वाले हैं। शैली इसी वजह से हड़बड़ा रही थी। बच्चों की पढ़ाई को ले कर वो बहुत सीरियस थी। बच्चे भी बड़े अच्छे नम्बरों से पास होते, अभी भी वह चाहती थी उसके बच्चों की सारी तैयार...

चलो यहीं रहते हैं - नीता झा

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दसरी जल्दी जल्दी कदम बढ़ती घर की तरफ बढ़ रही थी। अचानक धुंधलके में आज फिर पत्थर से टकरा गई पिंडली में दर्द हुआ शायद थोड़ी बहुत खरोच आई होगी उसने हाथ लगया तो गीला-गीला लगा शायद थोड़ा बहुत खून निकल गया होगा दर्द की परवाह किए बिना चली जा रही थी। इतने में दीदी दिख गई बैठने कहा वो नहीं मानी दीदी ने देखा वह अपनी साड़ी में कुछ रखे हुए थी क्या है? कुछ नही बस थोड़ी सी चना भाजी है मंगली के साथ मिलके तोड़ी थी तो वो बनाई तो थोड़ी भाजी दी है। चना भाजी! दीदी की आंख चमक गई दसरी को पता था वो जहर भी खाएगी तो वो दीदी को चाहिए मुस्कुरा कर बोली चल अंदर थोड़ी तू भी ले ले दोनों बहने अंदर गईं अभी बैठी भी नहीं थी कि रतन आ गया" माँ ...कबसे ढूंढ रहा हूं ! बताके भी तो आना था रात हो गई ! फिर अपनी मौसी की तरफ देखकर बोला "पता है मौसी आजकल रात में थोड़ा कम दिखता है कितनी बार बोलता हूं कहीं जाओ तो किसी को साथ रख लिया करो पर माँ माने तब ना" यहां काहे का डर? ये उसका अपना गांव है बेटा यहीं जन्मी है   गांव में क्या डर तू बहुत चिंता करता है  फिर दीदी की तरफ देखकर बोली दीदी जल्दी कटोरी ला अब घर जाऊंगी घर म...

गांव की मिट्टी - नीता झा (कहानी)

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सुलभा ने साड़ी ठीक करते हुए आवाज़ लगाई जय-विजय पानी ज्यादा रखना नहीं तो पापा के सामने लड़ने लगोगे पिछली बार की तरह और चप्पल पहनती हुई बाहर आ गई उसके हाथ में नाशते का थैला था। अपने गांव की सीमा में लगे प्लाट पर पहुंच कर तीनो ने बड़े आदर भाव से शहीद विनोद की प्रतिमा को प्रणाम किया और बड़े मनोयोग से प्रतिमा,चबूतरे और आस-पास की जगह को हंसी मजाक और नोक-झोंक करते हुए साफ करने के बाद विनोद की प्रतिमा के पास बैठ गए तीनो अपनी अपनी बातें, शिकायतें सारा कुछ  शेयर करते करते चार प्लेट नाश्ता निकल कर उसमें से एक प्लेट शहीद विनोद के सामने रखकर बड़े ही श्रद्धा भाव से नमन करके उसे तीनो प्लेट में बांट कर खाने बैठ गए। एकबार कुछ लोग यहां की बातें फोटो वगैरह लेने सरपंच जी के यहां परमिशन लेने गए तो उन्होंने बड़े प्यार से समझाया - "आप बाकी किसी भी समय हमारे विनोद बाबू की फोटो ले लीजिए उनके पूरे गाँव की पर ये समय उनके परिवार का होता है तब हम क्या उनके परिवार के बाकी लोग तक वहां नहीं जाते ठीक वैसे ही जैसे रविवार को आप अपने परिवार के साथ अपना समय बिताते हैं।  सिर्फ और सिर्फ आपके बीवी बच्चो...

देश सेवा - नीता झा

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देश भक्ति- लघुकथा    उर्वी धीरे से दरवाज़ा खोल कर  आंगन में आ गई पलटकर देखा कोई जाग तो नहीं रहा है? कुछपल दरवाजे की तरफ देखती रहीं फिर कोई आहट न पाकर बाहर निकलने लगीं तभी सनद ने आवाज़ लगाई-" दादी रुकिए मैं भी आ रहा हूं"    तुम इतनी सुबह क्यों उठ गए रात देर तक पढ़ाई करते हो जाओ सो जाओ नीद पूरी करना भी तो जरूरी है    सनद कहाँ सुनने वाला था  चल पड़ा दादी के साथ ।    अच्छा दादी आप लोग इतनी सुबह उठ कर रोज पार्क में लोगों को योग,ध्यान,प्राणायाम सिखाते हैं वो भी फ्री में ऊपर से जो सीखना चाहता है उसे संस्कृत और कोई भी सब्जेक्ट पढ़ाते हैं। लेकिन क्यों करते हैं आप लोग ये सब ?    पापा मम्मी तो कह रहे थे अब आप लोग रिटायर होकर हमारे पास रहेंगे तो हमे आपको कोई काम नहीं करने देना है खूब आराम करवाएंगे"     उर्वी सनद की बातें सुनकर चोंक गईं     पर क्यों आराम करेंगे?     हमे कोई बीमारी हुई है क्या?     नहीं दादी पापा मम्मी कह रहे थे आपने और दादू ने बहुत मेहनत कीहै सबको बड़ा करने म...

बलिदान - नीता झा

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बलिदान  केतकी ने अपनी साइकिल उठाई और गांव के बाहर वाले तालाब के किनारे पहुंच गई वहां पहुचते पहुचते उसकी रुलाई फुट गई साइकिल आम पेड़ के नीचे लगाकर वह वहां बैठ कर फुट फुट के रोने लगी उसके जेहन में सारी पिछली बातें आने लगीं किस तरह उसने अपने दादाजी और अपने दोस्तों के साथ मिलकर अपनी ग्रामीण सेना बनाई थी जो रोज एक दो घण्टे कोई भी भलाई का काम करते थे पूरे महीने भर का प्लान पहले से बना कर रखते थे दादाजी की देखरेख में सब काम बहुत व्यवस्थित होता था अपने  सेना में रहने के समय के बहादुरी भरे किस्सों के साथ ही वे अपने साथी भाइयों के बलिदानों के किस्से बताया करते साथ ही बच्चों में उच्च आदर्शों का बीजारोपण भी करते रहते उनमें नेतृत्व की छमता भी गजब थी अब तो बच्चों के साथ साथ बड़े भी उनकी इस पुनीत कार्य में मदद करते थे।   पिछले महीने ही तो दादाजी ने फलदार पेड़ों के पौध लगवाए थे ताकि आने वाले बरसात के मौसम में हर घर में एक एक फलदार पेड़ हों।    कुछ दिन पहले की ही तो बात हैअटैक आने से दादाजी चल बसे थे बहुत कोशिशों के बाद भी उन्हें नहीं बचाया जा सका था  तबसे वह इधर आ ...

किसी पे तंज कसने से पहले

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किसी पे तंज कसने से पहले ख़ुद को भी परखना चाहिए  जब हम खुद का आंकलन सही करते हैं तो दूसरों की कमियां नहीं दिखतीं हमारा अपना नजरिया जितना व्यापक होगा हम उतना ही दूसरों की अच्छाइयों को महसूस कर पाएंगे    सौम्या ने वीकेंड अपनी सारी स्कूल फ्रेंड्स को बुलाया एक ही शहर में होने के बावजूद सबका आपस मे मिलना नहीं हो पाया था। सबकी अपनी अपनी ज़िंदगी अपने- अपने मायाजाल ।   प्राची,तान्या,वैशाली और सौम्या ने स्कूल ,कॉलेज की पढाई एकसाथ ही की सब्जेक्ट चाहे अलग अलग थे कॉलेज एक था। सबकी फैमली भी आपस मे घुली- मिली थी । सुमि की शादी का समय आया परिवार के अलावा इन फ्रेंड्स की सलाह  भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी कुल मिला कर ये अलग अलग फूलों के खूबसूरत से गुलदस्ते थे।   सौम्य की शादी को 4 महीने हुए थे सबसे पहले उसी की शादी हुई थी तो सारी सहेलियां उसका घर परिवार देखने को बड़ी उत्सुक थीं और उसने अबतक किसी को लंच या डिनर पर नहीं बुलाया था बाहर उनका मिलना हुआ था वो वरुण के साथ सबके साथ मिली थी लेकिन उसके घर उसकी चंडाल चौकड़ी नही आई थी । सबसे ज्यादा तान्या छेड़ती थी उसने तो कंजूस कपल...

मैं बंजारा (लघुकथा) - नीता झा

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मैं बंजारा मालिनी मूवर्स एन्ड पैकर्स वाले को फोन लगा रही थी। पहल, प्रिशा गुमसुम से सोफे में बैठे थे। मुझे बहुत से काम थे लेकिन बच्चों की मायूसी मुझे उनके करीब खींच लाई थी मेरे पास बैठते ही नन्ही प्रिशा मुझसे लिपट गई और पहल भी मेरे पास सरक कर बैठ गई मैन उनकी उलझन पढ़ ली थी और बस इतना ही कहा -क्या हुआ मेरी परियां उदास क्यों हैं? प्रिशा ने शिकायत और उदासी के मील जुले स्वर में कहा-" पापा आपका फिर ट्रांसफर हुआ है मम्मा बता रही थीं वहां और भी ज्यादा फेसिलिटीज हैं पर पापा 15 फैब दी के बेस्ट फ्रेंड तनिष्क का बर्थडे है उसने ग्रेंड पार्टी ऑर्गनाइज की है पापा सबने हमे बहुत रोक है क्या करें ?" पहल ने कुछ कहा नहीं पर प्रिशा की बातों में सहमत लगी टीनएजर्स की फ्रेंडशिप मतलब भरोसे, अपनेपन, प्यार, स्वप्नलोक का पहला  पायदान ज़िंदगी की कभी न भूलने वाली दोस्ती और प्यार की पहली फुहार जिसे बच्चे या तो समझ ही नहीं पाते या बता नहीं पाते, मैं चुप था समझ में नहीं आ रहा था क्या कहूँ एक महीना रुक भी नहीं सकता इतनी दूर आना लगभग असम्भव ही था मैं आश्वासन देकर मुकरना नहीं चाहता था अपनी नोकरी की ...

मम्मी की मुस्कुराहट - (लघुकथा) नीता झा

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शाम होने को आई थी और पूर्वी अबतक घर नहीं आई थी।अनुजा को थोड़ी चिंता हुई फिर मन ने तर्क  दिया शायद अपनी फ्रेंड रिया के घर गई होगी अनुजा पहले इतनी परेशान नहीं होती थी पर आजकल कई घिनोने केसेस होने लगे हैं तो बच्चे बाहर जाते हैं और इधर मन घबराने लगता है परसों की ही बात है अनुजा ने पूर्वी को तीन घण्टे में दो बार फोन लगा दिया पहले वो ऐसा नहीं करती थी पूर्वी ने घर आकर कहा मम्मी आप बार बार फोन क्यों लगा रहे थे मैंने बताया तो था शैली के साथ प्रोजेक्ट बना रही हूं आप बहुत डरते हो। उसकी समझ में नहीं आया क्या कहे दीपक ने  बात सम्हाली बेटा तुम्हारी माँ तुम्हारी सुरक्षा को लेकर थोड़ी भयभीत है तुमसे प्यार जो इतना करती है।    बात आई गई हो गई आज फिर वो घबराने लगी शाम हो रही थी वो शाम की आरती करने पूजा कमरे में गई ही थी की पूर्वी ने उसे पीछे से आकर गले लगा लिया फिर दोनों ने आरती की फिर उर्वी ने कहा मम्मी आप ना मुझे हमेशा मुस्कुरा कर विदा करती हो पर कुछ दिनों से वो मुस्कान गायब है।        हां बेटू मुझे तेरी बहुत फिक्र होती है उसने बीच में ही बात काटकर कहा अ...

दीवारों के भी कान होते हैं - नीता झा (कहानी)

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     सफलता पर लेषमात्र भी संशय न था किन्तु डर था कहीं कुछ ऐसा न हो जाए जिससे कहीं कोई गड़बड़ हो और इन तीनो भाई- बहन की सारी तैयारी धरि की धरि रह जाए तीनो रात में काफी देर तक कल सुबह की तैयारियों पर चर्चा करते रहे सनी के बड़प्पन का स्नेहा और सनद सम्मान करते थे पर स्नेहा सनद की चर्चा बार बार झड़प में बदल जाती तब सनी ही शांत कराता।      इधर परेश प्रीति की आंखों से भी नींद नदारत थी जिस अवकाश को नौकरी के दौरान तरसते थे वो अब हमेशा के लिए रिटायरमेंट की शक्ल में उन्हें डरा रहा था थे।             खैर न वक्त रुकता है न वक्त के निर्धारित फैसले, कल सुबह उठना भी है कह कर प्रीति ने लाइट ऑफ करदी      सुबह सुबह दैनिक कार्यों से निवृत होकर जब प्रीति परेश हॉल में आए उनकी सोच के विपरीत घर पूरी तरह से साफ सुथरा, व्यवस्थित था, कल ऑफिस विदाई समारोह से लौटने के बाद वे सब काफी थक गए थे तो सब सुबह समेटेंगे सोचकर बच्चे ऊपर आराम करने चले गए थे।            प्रीति समझ गई उसे ज्यादा थकी हुई देख प्रा...

एक बच्चे का जन्म - Neeta Jha

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एक बच्चे का जन्म - Neeta Jha अच्छी शिक्षा के लिए हर विषय के अलग शिक्षक  का होना जरूरी है। फिर चाहे वह किसी भी कक्षा की पढ़ाई क्यों न  हो इससे बच्चे का सभी विषयों पर एक्सपर्ट द्वारा पढ़ाया जाना उसके उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है। वहीं बच्चे के सर्वांगीण विकास हेतु परिवार और आसपास के परिवेश की भी अहम भूमिका होती है।               सत्तर के दशक के लोग जिन्होंने आज़ादी को महसूस किया है उन्होंने बचपन की कितनी ही रातें अपने अड़ोस - पड़ोस या रिश्तेदारी के स्वतंत्रता सेनानी,शहीद परिवार या वर्तमान समय मे भी सच्चे देशभक्त किरदारों की कथाओं के साथ ही गुजरती थीं वो नाना-नानी, दादा-दादी से किस्सों कहानियों के साथ जीवन जीने के गुर भी कब सीख जाते पता भी नही चलता  अलग-अलग लोग, भाषाएं, परिवेश में किस्से कहे जाते चाहे वह गीत, संगीत के माध्यम से हो या और किसी तरह से हो सबका सार होता बच्चों का सर्वांगीण विकास तथा अपनी अपनी ख़ास कला या विद्या से आनेवाली पीढ़ी को पोषित करना इसके केंद्र में यह भावना होती थी फलां बच्चा मेरी विद्या का सही ला...

छोटा सा घर (लघु कथा) - नीता झा

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लघु कथा- छोटा सा घर     बस में बैठते ही शेफाली अपनी पुरानी यादों में खो गई  वो गांव, वहां की आबोहवा, वहां के सारे चिर परिचित चेहरे, हर चेहरे से झलकता आत्मीय रिश्ते का नाम और उन तमाम नामो में सर्वोपरि पुजारिन नानी।      उनका ख्याल आते ही शेफाली का मन भर आया वह भावुक हो गई किसि तरह रजत ने उसे समझा बुझा कर शांत किया और उसकी तन्द्रा वापस उन्ही गलियों में विचरने लगी मंदिर के प्रांगण में स्थित छोटा सा घर जिसमे वह बड़े लाड़ प्यार से नानी के साथ रहती थी नानी मंदिर की अघोषित सर्वेसर्वा थीं और वो उनकी सबकुछ थी।      कुछ बड़ी हुए तो उसे पता चला कोई उसे मंदिर प्रांगण में छोड़ गया था और नानी ने उसे पालपोस कर बड़ा किया और जब वह पढ़ लिख कर योग्य हो गई तो सर्ववगुण सम्पन्न रजत से व्याह करवाया बड़े ही मनोयोग से सारे गांव ने मिलकर इस बिटिया का व्याह रचाया खबर आई थी नानी बीमार हैं शेफाली के सास ससुर ने दोनों को नानी को अपने घर लिवा लाने भेजा ताकि उनका समुचित इलाज हो सके और  नानी अब बाकी जीवन आराम से उनके साथ रह सकें।      नीता झा   ...