हमारे प्राचीन ऋषियों के कठोर तप से प्राप्त अथाह ज्ञान का यदि एक पासंग भी हम समझ पाए तो जीवन सार्थक हो जाएगा भयत गर्व होता है। वायु एक छोटा सा शव्द ठीक ॐ या माँ की तरह विशाल, व्यापक हमारे जीवन की उतपत्ति के आधार पंच तत्वों में से एक जो हमेशा हमारे स्थूल से लेकर सूक्ष्म शरीर मे पांच तरह से विद्यमान होते हैं जिनका संतुलन निश्चय ही सम्पूर्ण स्वस्थ के लिए आवश्यक है। जो दृष्टिगोचर न होकर भी हमे सदैव संचालित करे उन्हें हम आदर देते हैं। फिर वो जड़, चेतन, दृश्य, अदृश्य हो यही तो हमारी ऋषि परम्परा की सबसे बड़ी विशेषता है। उनका गहन अध्ययन और उससे अर्जित अद्भुत ज्ञान जब हम पूरी श्रद्धा से जिज्ञासु भाव लेकर ग्रन्थों का अध्ययन करते हैं तब बहुत से रहस्योद्घाटन होते हैं।
यौगिक प्रार्थना - नीता झा
श्लोक - योगेन्चित्तस्य पदेन वाचां। मलं शरीरस्य च वैद्य केन।। योपाकरोत्तं प्रवरं मुनिनां पतन्जलिं। प्रान्जलिरानतोस्मि।। हिंदी अनुवाद- योग से चित्त का,पद से वाणी का। व वैद्यक से शरीर का, मल जिन्होंने दूर किया उन मुनि श्रेष्ठ को मैं, अंजलिबद्ध नमस्कार करता हूँ। व्याकरणाचार्य भरत्य हरी जी ने अपने ग्रंथ "वात्यपदीय" के मंगलाचरण में महर्षि पतन्जलि की स्तुति में करबद्ध प्रार्थना स्वरूप शलोक की रचना की आइए हम भी अपने दिन की शुरूआत ऐसे ही मनोभाव से करें..... नीता झा
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