हमारे प्राचीन ऋषियों के कठोर तप से प्राप्त अथाह ज्ञान का यदि एक पासंग भी हम समझ पाए तो जीवन सार्थक हो जाएगा भयत गर्व होता है। वायु एक छोटा सा शव्द ठीक ॐ या माँ की तरह विशाल, व्यापक हमारे जीवन की उतपत्ति के आधार पंच तत्वों में से एक जो हमेशा हमारे स्थूल से लेकर सूक्ष्म शरीर मे पांच तरह से विद्यमान होते हैं जिनका संतुलन निश्चय ही सम्पूर्ण स्वस्थ के लिए आवश्यक है। जो दृष्टिगोचर न होकर भी हमे सदैव संचालित करे उन्हें हम आदर देते हैं। फिर वो जड़, चेतन, दृश्य, अदृश्य हो यही तो हमारी ऋषि परम्परा की सबसे बड़ी विशेषता है। उनका गहन अध्ययन और उससे अर्जित अद्भुत ज्ञान जब हम पूरी श्रद्धा से जिज्ञासु भाव लेकर ग्रन्थों का अध्ययन करते हैं तब बहुत से रहस्योद्घाटन होते हैं।
सूर्यनमस्कार-
सूर्य नमस्कार वैदिक काल से हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा भगवान सूर्य की उपासना तथा स्वास्थ्य लाभ हेतु की गई आसनों की अत्यंत प्रभावशाली श्रंखला है। नियमित रूप से सूर्यनमस्कार करने के शारिरिक एवं मानसिक सकारात्मक प्रभाव सहज ही दिखने लगते हैं। सूर्यनमस्कार पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर करना चाहिए। सूर्यनमस्कार करने के लिए सबसे सही समय सूर्योदय के समय होता है। सुबह नित्यकर्म से निवृत होकर खाली पेट सूर्यनमस्कार करना चाहिए। सूर्यनमस्कार तथा अन्य आसनों के आधे धंटे तक कुछ भी खाना पीना नहीं चाहिए। वैसे तो सूर्यनमस्कार आराम से करना चाहिए जल्दी जल्दी नहीं करना चाहिए। यदि मोटापा कम करना हो तो जल्दी जल्दी सूर्यनमस्कार करना चाहिए। सूर्यनमस्कार में सात आसन होते हैं जिनमे शुरू के पांच तथा आखरी के पांच आसन समान होते है। छठवां तथा सातवां आसन एक बार ही किया जाता है। इनकी बारहों आसनों के नाम तथा बारह मंत्र ये है.... 1 ॐ मित्राय नमः - प्रणाम आसन - सामान्य सांस 2ॐ रवये नमः - हस्तोतानासन - सांस भरें 3ॐ सूर्याय नमः - पादहस्तासन - सांस बाहर 4ॐ भानवे नमः- वाम अश...
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