सूर्य नमस्कार वैदिक काल से हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा भगवान सूर्य की उपासना तथा स्वास्थ्य लाभ हेतु की गई आसनों की अत्यंत प्रभावशाली श्रंखला है। नियमित रूप से सूर्यनमस्कार करने के शारिरिक एवं मानसिक सकारात्मक प्रभाव सहज ही दिखने लगते हैं। सूर्यनमस्कार पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर करना चाहिए। सूर्यनमस्कार करने के लिए सबसे सही समय सूर्योदय के समय होता है। सुबह नित्यकर्म से निवृत होकर खाली पेट सूर्यनमस्कार करना चाहिए। सूर्यनमस्कार तथा अन्य आसनों के आधे धंटे तक कुछ भी खाना पीना नहीं चाहिए। वैसे तो सूर्यनमस्कार आराम से करना चाहिए जल्दी जल्दी नहीं करना चाहिए। यदि मोटापा कम करना हो तो जल्दी जल्दी सूर्यनमस्कार करना चाहिए। सूर्यनमस्कार में सात आसन होते हैं जिनमे शुरू के पांच तथा आखरी के पांच आसन समान होते है। छठवां तथा सातवां आसन एक बार ही किया जाता है। इनकी बारहों आसनों के नाम तथा बारह मंत्र ये है.... 1 ॐ मित्राय नमः - प्रणाम आसन - सामान्य सांस 2ॐ रवये नमः - हस्तोतानासन - सांस भरें 3ॐ सूर्याय नमः - पादहस्तासन - सांस बाहर 4ॐ भानवे नमः- वाम अश...
हमने योग के पहले क्या करें क्या न करें पर चिंतन किया अब बात करते हैं योग के लिए खुद को कैसे तैयार किया जाए। इसकी तैयारी हमे सोने के समय से करना है अर्थात इतनी जल्दी सोएं की अपनी आयु, श्रम के अनुसार हमारी नींद पूरी हो जाए। सुबह उठकर नित्यकर्म से निवृत हो कर इतने ढीले कपड़े पहने संभव हो तो होजियरी मटेरियल के रोवर की शर्ट पहने जिससे आपको आसन करते समय बंधा - बंधा न लगे यदि सम्भव हो तो योग के लिए जो कपड़े मिलते हैं वे ले सकते हैं या सलवार- कुर्ती पहने यदि साड़ी पहन कर ही योग करना हो तो लहंगा ढीला बांधें साथ ही सलवार या स्ट्रेचेबल लैगिंग्स जरूर पहन लें। जिससे पैरों को फैलाने वाले आसन करने में आप सुविधा का अनुभव करें, ब्लाउज वगैरह भी ढीले ही पहने ताकि आसन करते समय सांस लेते छोड़ते या झुकने, मुड़ने में परेशानी महसूस न हो। अपने बालों को अच्छी तरह कंघी करके चोटी बनाएं या थोड़ा ऊंचा जुड़ा डाल लें जिससे आसन करते समय चेहरे के सामने बाल न आएं। घने, लम्बे बाल हों तो बहुत कड़ी चोटी भी न बंधे नहीं तो लेट कर गर्दन सम्बंधित आस...
श्लोक - योगेन्चित्तस्य पदेन वाचां। मलं शरीरस्य च वैद्य केन।। योपाकरोत्तं प्रवरं मुनिनां पतन्जलिं। प्रान्जलिरानतोस्मि।। हिंदी अनुवाद- योग से चित्त का,पद से वाणी का। व वैद्यक से शरीर का, मल जिन्होंने दूर किया उन मुनि श्रेष्ठ को मैं, अंजलिबद्ध नमस्कार करता हूँ। व्याकरणाचार्य भरत्य हरी जी ने अपने ग्रंथ "वात्यपदीय" के मंगलाचरण में महर्षि पतन्जलि की स्तुति में करबद्ध प्रार्थना स्वरूप शलोक की रचना की आइए हम भी अपने दिन की शुरूआत ऐसे ही मनोभाव से करें..... नीता झा
बहुत बढ़िया नीता ,पूरी फ़ोटो भी अति सुन्दर दिखी ।
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