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महिला दिवस की शुभकामनाएं - नीता झा ।

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मैं ही तो थी जिसे लगया गया। छठी में नजर का काला टीका।। हाथों में मेहदी का सुंदर टीका। रूप निखार तमाशा बनाया।। मैं ही तो थी जिसे लगाया गया। टेसू के मादक फूलों का सुंदर रंग।। चन्दन फूल अबीर गुलाल के सँग। फिर खेला गया मुझसे हो मलंग।। मैं ही तो थी जिसे लगाया गया। चटख लाल पारे का तेजस सिंदूर।। पाँव सजाता औषधीय लाल माहुर। शर्तों पर मिलता पोषण भरपूर।। मैं ही तो थी जिसे लगाया गया। कभी चन्दन कभी हल्दी नीम।। अनगिनत सुगन्धित उबटन। रूप निखारने के किये जतन।। मैं ही तो थी जिसे बिठाया गया। सदैव सभी अपनो ने पलकों पर।। सुरक्षित रखा हीरे मोती की तरह। धारण किया किसी जेवर की तरह।। मैं ही तो थी जिसे चलाया गया। सदमार्गी तप्त महीन कंकड़ों पर।। मरहम लगा न रुकने के वादे पर। कुल मर्यादा की गठरी पकड़ा कर।। मैं ही तो थी जिसे चलाया गया। बहुतेरे सवालों के कंटीले पथ पर।। उम्मीदों की काई भरी डगर पर। परखा जाता ढेरों कसौटियों पर।। मैं ही तो थी जिसे चलाया गया। मित्रता के नाम छद्म मार्ग पर।। भ्रामक मोहपाश के जाल पर। छला गया अमरप्रेम के नाम पर।। मैं ही तो थी ठिठक ठिठक चलती। अपने वजूद को आँचल से ढकती।। कुत्सित भा...

दर्द की कोख से उपजी मुस्कान - नीता झा।

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के कोख से उपजी मुस्कान एक दिन अनिता दीदी का फोन आया "जय कांत मिश्र जी भाषा सहोदरी के संस्थापक हैं। मॉरीशस में  विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर भव्य कार्यक्रम करने जा रहे हैं। हिंदी के आलेख व शोध की पुस्तक का विमोचन होगा क्या तुम जाना चाहोगी? मॉरीशस.....  हाँ मॉरीशस चलो चलते हैं.....  मुझसे कुछ कहते नहीं बना-" सोच कर बताती हूँ दीदी" कहकर फोन रखा।  यादों के गलियारे से बचपन वाली कुछ पोटलियां खुलनी शुरू हुई।  हमारे घर मे धर्मयुग नामक मासिक पत्रिका आती थी। जिसमे हर विषय पर आर्टिकल्स लिखे होते थे सम्भवतः  बाल सुलभ उत्सुकता हो या शुद्ध हिंदी उच्चारण हेतु पिताजी हमसे कुछ पढ़वाया करते थे। इसी दौरान पढ़ी थी फिर बड़ी हुई तो गिरमिटिया मजदूरों के विषय मे सुन रखा था। जिसमे बचपन से मॉरीशस के विषय मे जाना, समझा मुझे कमोबेश अंडमान निकोबार के काला पानी से मिलती जुलती परिस्थितियों का आभास हुआ मैने सोच रखा था। काला पानी और मॉरीशस अवश्य जाउंगी ये मेरा मानना है ये दोनों जगहें हर भारतीय के लिए तीर्थ हैं। अपने जीवन काल मे इन जगहों के दर्शन करना ही ...

सहित्योदय और अयोध्या यात्रा। - नीता झा।

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हमारी निर्वि प्यारी निर्वि - नीता झा

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*तीन महीने की हुई है निर्वि... तीसों नखरे दिखाए रही है।। मात पिता और दादा दादी... फुले नहीं समाए रहे हैं।। भाग्य से आई बेला सुहानी... दादी बलाएं उतार रही है।। तीन महीने की हुई है निर्वि... तीसों नखरे दिखाए रही है।। निर्वि से घर मे खुशी जगी... घर की शोभा बढ़े रही है।। शुभ प्रसंग की बेला आई... नानी गीत गाए रही है।। तीन महीने की हुई है निर्वि... तीसों नखरे दिखाए रही है।। अरे रतजगे की आदि निर्वि... सबको रात जगाए रही है।। शुद्धमति निर्वि देवी स्वरूपा... बाल लीला से हंसाए रही है।। नीता झा*

मैं कुंदन बन निखर गई.... नीता झा।

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थाम लिया सहज ही हमको.. सबसे मजबूत सहारा रहा।। चटक सिंदूरी या था उदास.. नया नेवला या पैबस्त भरा।। पर वो तो सदा हमारा रहा.. मां सच कहते हैं हम तुमसे।। आंचल तुम्हारा छत जैसा.. सदा मेरा पता दिया करता ।। मैं थामे आंचल चलती थी.. सारी विपदा तुम से होकर।। यदा कदा मुझ तक आती.. कौन सा जादू है बताओ।। तुम्हारे कोमल आंचल में.. काल गति भी ठिठक गई।। हौले से फिर बुझी निकली.. तुम्हारे आंचल की छांव में।। मैं तो कुंदन बन निखर गई.. मैं तो कुंदन बन निखर गई।। नीता झा 

युद्ध अभी आरम्भ हुआ नहीं....नीता झा।

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युद्ध अभी आरम्भ हुआ नहीं.. पाञ्चजन्य अभी बजा नहीं है।। तैयारी अभी बिल्कुल हुई नहीं.. तरकश भरे तीरों से खचाखच।। पर प्रत्यंचा अभी है चढ़ी नहीं.. अस्त्र शस्त्र की कहीं कमी नहीं।। और सेना सरहदों पर डटी हुई.. मारक इरादों से मजबूत खड़ी।। युद्ध अभी आरम्भ हुआ नहीं.. पाञ्चजन्य अभी बजा नहीं है।। पंचतत्व की मेरी माता सजीव.. सब सैनिक को गोदी में रखती।। तुम कहते जिसे निर्जन मरु वह.. अग्नितत्व की हमारी ऊर्जाश्रोत।। माँ नदियाँ हमें रस पान कराएं.. जल को दुग्ध सी पोषक बनाएं।। युद्ध अभी आरम्भ हुआ नहीं.. पाञ्चजन्य अभी बजा नहीं है।। वहीं खारा समंदर अपने अंदर.. सुरक्षित रखता अद्भुत सेनाबल।। पवन देव भी हर इक कोने में रह.. प्राणवायु संग सबमे उत्साह भरें।। माँ भारती का हिमगिरि मस्तक.. सैनिक सजा रहा बिंदिया सदृश्य।। छू लेने को आतुर वायुवीर प्रहरी.. उन्मुक्त लहराते तिरंगा हर प्राचीर।। युद्ध अभी आरम्भ  हुआ नहीं.. पाञ्चजन्य अभी बजा नहीं है।। ये तो आखेटक सी पहरेदारी है.. कोई धूर्त न आए सरहद भीतर।। इस खातिर चौकस जान रखी है.. न समझो युद्ध करने की चाह है।। पर फिर न करना पीठ पर प्रहार.. इस लिए खुद को सतर...

बुलंदी वृहद कविसम्मेलन - नीता झा

 साहित्यिक यात्रा..... सुखद साहित्यिक यात्रा...... एक गर्वित सुखद साहित्यिक काव्यात्मक यात्रा..... बुलंदी समूह के संचालक श्री विवेक बादल बाजपुरी  जी हां बुलंदी के साथ जुड़े भारतीय कवियों तथा कवित्रियों के साथ ३४ अलग - अलग देश के भारतीय बंधुओं ने विगत वर्ष के स्वयं में बनाए २०७ दो सौ सात घण्टे के कीर्तिमान को तोड़ते हुए विश्व के सबसे बड़े कविसम्मेलन यानी अबतक ३३० तीन सौ तीस घण्टे से अधिक समय के कविसम्मेलन को समाचार लिखे जाने तक जारी रखा है। देखने वाली बात है कि यह श्रंखला और कितनी वृहत हो सकती है। इस सफल कविसम्मेलन  में  रायपुर छत्तीसगढ़ की श्रीमती नीता झा ने भी हिस्सा लिया और विविध विषयों पर अपनी स्वरचित कविता का पाठ किया।   इस आयोजन में भारत के कवियों के अतितिक्त ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस, थाईलैंड, सऊदी अरब, जकार्ता, इंडोनेशिया, पुर्तगाल, कतर इत्यादि लगभग ३४ देश के लोगों ने भी बड़े उत्साह से हिस्सा लिया।  नीता झा रायपुर, छत्तीसगढ़