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हमारी निर्वि प्यारी निर्वि - नीता झा

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*तीन महीने की हुई है निर्वि... तीसों नखरे दिखाए रही है।। मात पिता और दादा दादी... फुले नहीं समाए रहे हैं।। भाग्य से आई बेला सुहानी... दादी बलाएं उतार रही है।। तीन महीने की हुई है निर्वि... तीसों नखरे दिखाए रही है।। निर्वि से घर मे खुशी जगी... घर की शोभा बढ़े रही है।। शुभ प्रसंग की बेला आई... नानी गीत गाए रही है।। तीन महीने की हुई है निर्वि... तीसों नखरे दिखाए रही है।। अरे रतजगे की आदि निर्वि... सबको रात जगाए रही है।। शुद्धमति निर्वि देवी स्वरूपा... बाल लीला से हंसाए रही है।। नीता झा*

मैं कुंदन बन निखर गई.... नीता झा।

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थाम लिया सहज ही हमको.. सबसे मजबूत सहारा रहा।। चटक सिंदूरी या था उदास.. नया नेवला या पैबस्त भरा।। पर वो तो सदा हमारा रहा.. मां सच कहते हैं हम तुमसे।। आंचल तुम्हारा छत जैसा.. सदा मेरा पता दिया करता ।। मैं थामे आंचल चलती थी.. सारी विपदा तुम से होकर।। यदा कदा मुझ तक आती.. कौन सा जादू है बताओ।। तुम्हारे कोमल आंचल में.. काल गति भी ठिठक गई।। हौले से फिर बुझी निकली.. तुम्हारे आंचल की छांव में।। मैं तो कुंदन बन निखर गई.. मैं तो कुंदन बन निखर गई।। नीता झा 

युद्ध अभी आरम्भ हुआ नहीं....नीता झा।

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युद्ध अभी आरम्भ हुआ नहीं.. पाञ्चजन्य अभी बजा नहीं है।। तैयारी अभी बिल्कुल हुई नहीं.. तरकश भरे तीरों से खचाखच।। पर प्रत्यंचा अभी है चढ़ी नहीं.. अस्त्र शस्त्र की कहीं कमी नहीं।। और सेना सरहदों पर डटी हुई.. मारक इरादों से मजबूत खड़ी।। युद्ध अभी आरम्भ हुआ नहीं.. पाञ्चजन्य अभी बजा नहीं है।। पंचतत्व की मेरी माता सजीव.. सब सैनिक को गोदी में रखती।। तुम कहते जिसे निर्जन मरु वह.. अग्नितत्व की हमारी ऊर्जाश्रोत।। माँ नदियाँ हमें रस पान कराएं.. जल को दुग्ध सी पोषक बनाएं।। युद्ध अभी आरम्भ हुआ नहीं.. पाञ्चजन्य अभी बजा नहीं है।। वहीं खारा समंदर अपने अंदर.. सुरक्षित रखता अद्भुत सेनाबल।। पवन देव भी हर इक कोने में रह.. प्राणवायु संग सबमे उत्साह भरें।। माँ भारती का हिमगिरि मस्तक.. सैनिक सजा रहा बिंदिया सदृश्य।। छू लेने को आतुर वायुवीर प्रहरी.. उन्मुक्त लहराते तिरंगा हर प्राचीर।। युद्ध अभी आरम्भ  हुआ नहीं.. पाञ्चजन्य अभी बजा नहीं है।। ये तो आखेटक सी पहरेदारी है.. कोई धूर्त न आए सरहद भीतर।। इस खातिर चौकस जान रखी है.. न समझो युद्ध करने की चाह है।। पर फिर न करना पीठ पर प्रहार.. इस लिए खुद को सतर...

बुलंदी वृहद कविसम्मेलन - नीता झा

 साहित्यिक यात्रा..... सुखद साहित्यिक यात्रा...... एक गर्वित सुखद साहित्यिक काव्यात्मक यात्रा..... बुलंदी समूह के संचालक श्री विवेक बादल बाजपुरी  जी हां बुलंदी के साथ जुड़े भारतीय कवियों तथा कवित्रियों के साथ ३४ अलग - अलग देश के भारतीय बंधुओं ने विगत वर्ष के स्वयं में बनाए २०७ दो सौ सात घण्टे के कीर्तिमान को तोड़ते हुए विश्व के सबसे बड़े कविसम्मेलन यानी अबतक ३३० तीन सौ तीस घण्टे से अधिक समय के कविसम्मेलन को समाचार लिखे जाने तक जारी रखा है। देखने वाली बात है कि यह श्रंखला और कितनी वृहत हो सकती है। इस सफल कविसम्मेलन  में  रायपुर छत्तीसगढ़ की श्रीमती नीता झा ने भी हिस्सा लिया और विविध विषयों पर अपनी स्वरचित कविता का पाठ किया।   इस आयोजन में भारत के कवियों के अतितिक्त ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस, थाईलैंड, सऊदी अरब, जकार्ता, इंडोनेशिया, पुर्तगाल, कतर इत्यादि लगभग ३४ देश के लोगों ने भी बड़े उत्साह से हिस्सा लिया।  नीता झा रायपुर, छत्तीसगढ़    

हमारी हिंदी - नीता झा।

माँ की लोरी सी मधुर... जब हिंदी कंठ सजाती है।। सात सुरों से सजी धजी... पंचम सुर को भाती है।। दिए जलाए पानी लाएं... जब राग चरम पर होते हैं।। विश्व शांति की संवाहक हो... जो साहित्य मुखरित होते हैं।। सकल जगत को शांत करें... शक्ति का न कभी दम्भ भरें।। शिशुओं सी सुकोमल हिंदी... मन को सहज हर लेती है।। किन्तु कभी जो आए विपत्ति... विविध भाषाओं की जननी ये।। सब मे सहज घुलमिल जाती है... कालजयी रचनाएं गढ़ कर फिर।। चहुं ओर विजय पताका फहरा... युवाओं में देशभक्ति जगाती है।। मातृभूमि की बेड़ियां काट जब... विजय माँ भारती के भाल लगा।। हिंदी की महिमा द्विगुणित हुई... जब हिंदी की बिंदी माथ सजी।। सारी वसुधा को गौरान्वित करती... शान से खनकती हमारी हिंदी।। नीता झा रायपुर, छत्तीसगढ़
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चलने की ज़िद ही तो किए बैठा है.. क्यों मान भी नहीं लेतीं तुम बताओ!! किसने कहा खिलखिलाना मना है.. क्यों भान नहीं दुख का जरा बताओ!! परिधि में रह सोचती जमाना तंग है.. उड़ने हैं पंख कभी इच्छा तो बताओ!! रहो हल्की सी मानो पंख उड़ता है.. क्यों धरा सी उठाए हो सारा बताओ!! कदम आगे बढ़ाए पीछे न देखना है.. सपनो की खातिर अब हाथ मिलाओ!! चलो अब साथ नई डगर पर चलते हैं.. तुम आगे बढ़ मुझसे हाथ तो मिलाओ!! चलने की ज़िद ही तो किए बैठा है.. क्यों मान भी नहीं लेतीं तुम बताओ!! नीता झा रायपुर, छत्तीसगढ़

शून्य से होती यात्रा - नीता झा।

शू न्य से होती यात्रा सुखद होती है.. पग - पग स्वयं की परख होती है।। भान सदा कुछ हाथ सर पे मेरे हैं.. हर जीत उनकी मुस्कान होती है।। इस लिए खुद को बनाया दरपन है.. मेरे वजूद में घर की लाज दिखती है।। लोग शायद सीख लें हुनर मुझसे.. इस लिए उम्र सीखने में बिताई है।। सांसों का क्या जाने कब थम जाए.. इस लिए अपनो में जान बसाई है।। बहुत से लोग मेरे बाद जिएंगे मझको.. ऐसी कोशिश में जिंदगी बिताई है।। नीता झा रायपुर, छत्तीसगढ़