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सितंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

योग के लिए खुद को तैयार कैसे किया जाए - नीता झा

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      हमने योग के पहले क्या करें क्या न करें पर चिंतन किया अब बात करते हैं योग के लिए खुद को कैसे तैयार किया जाए।     इसकी तैयारी हमे सोने के समय से करना है अर्थात इतनी जल्दी सोएं की अपनी आयु, श्रम के अनुसार हमारी नींद पूरी हो जाए।     सुबह उठकर नित्यकर्म से निवृत हो कर इतने ढीले कपड़े पहने जिससे आपको आसन करते समय बंधा - बंधा न लगे यदि सम्भव हो तो योग के लिए जो कपड़े मिलते हैं वे ले सकते हैं या सलवार- कुर्ती पहने यदि आप साड़ी पहन कर ही योग करना चाहें तो लहंगा ढीला बांधें साथ ही सलवार या स्ट्रेचेबल लैगिंग्स जरूर पहन लें। जिससे पैरों को फैलाने वाले आसन करने में आप सुविधा का अनुभव करें, ब्लाउज वगैरह भी ढीले ही पहने ताकि आसनों करते समय सांस लेते छोड़ते या झुकते समय आपको परेशानी महसूस न हो।      फिर अपने बालों को अच्छी तरह कंघी करके चोटी  बनाएं या थोड़ा ऊंचा जुड़ा डाल लें जिससे आसन करते समय चेहरे के सामने बाल न आएं। घने, लम्बे बाल हों तो बहुत कड़ी चोटी भी न बंधे नहीं तो लेट कर गर्दन सम्बंधित आसन करते समय गले के नीचे चोटी आएगी तो आसन...

सागरिका की पवित्र नदी माँ कोसा विधा राशिफल संचालिका श्रीमती सरला झा एवम सखियां

​                  *दिनाँक : ~*   *27/09/2020,  रविवार* एकादशी, शुक्ल पक्ष अधिक आश्विन """"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""" (समाप्ति काल) तिथि --एकादशी 19:45:51 तक पक्ष ---------------------------शुक्ल नक्षत्र ----------श्रवण 20:48:37 योग ----------सुकर्मा 19:19:48 करण ---------वणिज 07:19:06 करण ------विष्टि भद्र 19:45:51 वार --------------------------रविवार माह ---------------- अधिक आश्विन चन्द्र राशि   ------------------- मकर सूर्य राशि ---------------------कन्या रितु -----------------------------शरद आयन ------------------दक्षिणायण संवत्सर --------------------- शार्वरी संवत्सर (उत्तर) -------------प्रमादी विक्रम संवत ----------------2077 विक्रम संवत (कर्तक)------2076  शाका संवत ----------------1942  वृन्दावन सूर्योदय -----------------06:11:12 सूर्यास्त -----------...

कोरोना के दौर में - नीता झा

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जीवन की हर परिस्थिति का हम सभी बड़ों पर अलग अलग प्रभाव पड़ता है। वैसे ही बच्चों पर भी हर परिस्थिति का काफी गहरा असर पड़ता है। कोरोना काल का भी बच्चों के मन मस्तिष्क में बड़ा गहरा असर पड़ा है। उनकी दिनचर्या भी पूरी तरह बदल गई है। आइये इस कविता के माध्यम से थोड़ी मुस्कुराहट लाएं। कोरोना के दौर में.. विपदा पड़ी है भारी!! दीदी टावर देखे छत पर.. भैया बोरियत की बीमारी!! बच्चे पकड़े मोबाइल.. घर मे होते बवाल!! जो मन आए कह दिए.. फिर चाहे जो हाल!! पढ़ते पढ़ते देख रहे सब.. कार्टून, गेम तमाम!! कोई आए अगर पास तो.. टीचर का रौब दिखाए!! पढ़ लिख होते बोर बहुत.. रसोई में मूड बनाए!! जैसे हो कोई बब्बर शेर.. ऐसे अकड़ दिखाए!! अपने मन की कह मम्मी से..  नाश्ते गरम बनवाए!! ठुमक चमक कर टीवी में..  अपनी ही चलाए!! कोई डांटे जरा कभी.. पल्लू में झट छुप जाए!! फिर धीरे से नजर बचा.. बहना को खुब चिढ़ाए!!  नीता झा

कुछ लम्हे उधार रहे - नीता झा

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         मन करे तो उड़ जाऊं क्या? सारे बंधन तोड़ चलूं क्या? जीने की ख्वाहिश जो जागी.. सारे अपने छोड़ चलूं क्या? पूछ रहा मन मेरा मुझसे... सबकी ख़ातिर रुक जाऊं क्या? दम घुटता है इस पिंजरे में... कौन इसे घर कहता है!! इसके हर कोने में सबका... उटपटांग हुकुम ही चलता है!! तभी कहीं से इक आवाज़ आई... जिसको तू पिंजरा कहती है... बेचैन बड़ी यहां फिरती है....  इसी ने महफ़ूज रखा अबतक!! सात वचनों से बंधा इक रिश्ता.. तुझपे ही तो है जान छिड़कता!! चाहती गर जाना यहां से... कुछ सपने तूझपे उधार रहे!! अपनी तू तस्वीर लेती जा... बाकी सब चेहरे उधार रहे!! अपनी कंचन काया लेती जा... मीठी छुवन के अहसास उधार रहे!! अपनी डिग्री तू सारी लेती जा... बच्चों की किलकारी उधार रही!! अपने सारे समान लेती जा... उनसे जुड़ी मुस्कान उधार रही!! अपनी सारी खुशियां लेती जा... मेरे ग़म के छाले उधार रहे!! इस घर की मलिका है तू...  हमारे कुछ  लम्हे उधार रहे!! समझ गई थी उस आवाज़ को... उसमें छलकते अधिकार को!! वह मेरी ही तो प्रतिध्वनि थी... जो मुझसे मुझे मिला रही थी!!     नीता झा

योग करने से पहले - नीता झा

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कुछ सामान्य विचार जो योग करने से पहले प्रायः सभी के मन मे आते हैं। सच कहूं तो मेरे मन के सवाल हैं जो मैं सोचा करती थी। मेरे पिताजी रोज सुबह उठकर योग किया करते थे संतुलित दिनचर्या, खान- पान और सभी बुरे व्यसनों से आजीवन दूर रहने का ही परिणाम था, कि ९३ वर्ष की जायु में बिना किसी कष्ट के उनका गोलोकवास हुआ। उस दिन तक भी उन्होंने यथाशक्ति अपने दैनिक कार्य किए यह योग के अष्टांग नियमो के पालन के कारण ही सम्भव हुआ।   मेरा योग से परिचय उन्होंने ही कराया फिर जब विभिन्न आसनों के शरीर मे स्वास्थ्य सुख की अनुभूति हुई तो कई लोगों से सीखती रही यह क्रम अभी भी अनवरत चल रहा है। आज हम कुछ प्रश्नों के माध्यम से योग को महसूस करेंगे- प्रश्न १ - योग में ऐसा क्या है कि सुबह सुबह की प्यारी सी मीठी नींद खराब की जाए? उत्तर- एक सामान्य वयस्क व्यकृ के लिए आठ से दस घण्टे की नींद पर्याप्त होती है। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए न इससे कम सोना चाहिए और न ज्यादा अब ये तो सभी जानते हैं सुबह की वायु शुद्ध होती है। सुबह सूर्य की किरण से हमे विटामिन डी मिलता है। जब उठना ही है तो क्यों ना थोड़ी जल्दी ही उ...

जो आ जाते एक बार - नीता झा

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जो तुम आ जाते एक बार मौसमो में फिर आती बहार कूकती कोयलें चलती फिर जेठ की दोपहरी ठंडी बयार जो तुम आ जाते एक बार निकाल संदूक से चुनर मैं बांध पावों में सुर झनकार राह रोकती सजन इस बार जो तुम आ जाते एक बार सजती कर सोलह सिंगार नयनो में कजरा होता और गले मोतियों का धवल हार जो तुम आ जाते एक बार लिख दिखाती पाती विरही अपने सुने बुझे से मन की  रोती तड़पती मन की पाती   जो तुम आ जाते एक बार नयनो में भरती छवि निराली अपनी हंसती, झूमती, गाती तुम संग नेह के पल जी लेती जो तुम आ जाते एक बार मिट जाती बाहों में तुम्हारी तूम क्या कहते जाने की तुमसे पहले विदा मैं होती        नीता झा        रायपुर  

खुशियों के मूल मंत्र मेरी नज़र में - नीता झा

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साथियों आज मैं आपको खुशियों के मूल मंत्र मेरी नज़र में जो है वह बताना चाहती हूं।               निरोगी काया, प्रसन्न मन और  ऊर्जावान जीवनशैली की बात ही कुछ और होती है। ये सब सफल जीवन के आधार हैं। इसलिए इनका ध्यान रखना भी हमारे जीवन की प्राथमिकता होनी चाहिए। तो आइए हम सर्वप्रथम विमर्श निरोगी काया पर करें।       निरोगी काया मतलब रोग रहित, व्याधि रहित काया का होना विरले ही मिलता है। इसके लिए खाद्य सामग्रियों की गुणवत्ता, उन्हें पकाने, खाने, खा कर पचाने फिर पचे हुए सत्व का शरीर पर किया जाने वाला शोषण और अवशिष्ट का सही समय, सही तरीके से निष्कासित होना ये सभी बातें संतुलित होनी चाहिए किन्तु ये सब संतुलित हों ऐसा सम्भव नहीं है। ऐसे में हमे अपने शरीर की देखभाल के लिए सतर्क रहना चाहिए यथासम्भव व्यायाम, योग, खेल- कूद, शारीरिक श्रम करते रहना चाहिए।       प्रसन्न मन- अपने आप को खुश रखना सबसे पहले हमारी स्वयं की जिम्मेदारी है। इसके लिए हम किसी और को हमेशा दोष नहीं दे सकते हां कभी - कभी जीवन की परेशानियां हमे तोड़ कर रख द...

बाबू उठ - नीता झा

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मेरी यह कविता सरकार की जनकल्याण हेतु बनाई गई विभिन्न योजनाओं की सही तरह से ईमानदारी से क्रियान्वयन न किए जाने पर होने वाली दुश्वारियों पर "बाबू उठ झौंहं उठा" लिखी गई है। जिस तरफ शुद्ध हिंदी के कठिन शब्दों के तड़के में छत्तीसगढ़ी गाने गाकर कचरा उठाने की अपील की जाती है। वह समझ से परे है। पढ़िए अपनी प्रतिक्रिया दीजिए मेरी लेखनी में कुछ सुधार चाहते है अवश्य मार्गदर्शन कीजिए....    बाबू उठ झौंहाँ उठा गोबर बिन के ला सरकार ला बेच दारू भट्टी जा दारू खरीद सरकार के मददकर शान से दारू पी कार्ड उठा  सस्ता अनाज ला लॉक डाउन में बैठ उसन के खा कभी थाली बजा कभी दिया जला कभी हाथ जले तक धो टीवी देख नया नया सीख रान्ध- गढ़ के खा सरकारी मैच देख कोन बनही राजा कौन बनही रंक मने-मन बांच फोन लगा चर्चा कर माइ- पिल्ला ल गरिया बचे दारू ल पानी संग पी लॉक आउट में बाहर जा गोबर बिन  सरकार ला बेच टीवी देख पता लगा कोन ह का गरी म फांसे गुटूर-गुटूर साहब ल पूछ निगम जा, पंचायत जा चारो मुड़ा पता लगा ए दारी का करे परही टीवी देख, पेपर पढ़ लोगिन ल पूछ, बता भीड़ लगा बीमारी बुला बेमार होगे त झन बता लापरवाही...

ये समय परिवार का - नीता झा

सुलभा ने साड़ी ठीक करते हुए आवाज़ लगाई जय-विजय पानी ज्यादा रखना नहीं तो पापा के सामने लड़ने लगोगे पिछली बार की तरह और चप्पल पहनती हुई बाहर आ गई उसके हाथ में नाशते का थैला था।      अपने गांव की सीमा में लगे प्लाट पर पहुंच कर तीनो ने बड़े आदर भाव से शहीद विनोद की प्रतिमा को प्रणाम किया और बड़े मनोयोग से प्रतिमा,चबूतरे और आस-पास की जगह को हंसी मजाक और नोक-झोंक करते हुए साफ करने के बाद विनोद की प्रतिमा के पास बैठ गए तीनो अपनी अपनी बातें, शिकायतें सारा कुछ  शेयर करते करते चार प्लेट नाश्ता निकल कर उसमें से एक प्लेट शहीद विनोद के सामने रखकर बड़े ही श्रद्धा भाव से नमन करके उसे तीनो प्लेट में बांट कर खाने बैठ गए।      एकबार कुछ लोग यहां की बातें फोटो वगैरह लेने सरपंच जी के यहां परमिशन लेने गए तो उन्होंने बड़े प्यार से समझाया - "आप बाकी किसी भी समय हमारे विनोद बाबू की फोटो ले लीजिए उनके पूरे गाँव की पर ये समय उनके परिवार का होता है तब हम क्या उनके परिवार के बाकी लोग तक वहां नहीं जाते ठीक वैसे ही जैसे रविवार को आप अपने परिवार के साथ अपना समय बिताते हैं।  सिर्फ और स...

कब, क्यों, क्या ??? - नीता झा

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कब तक बताऊं, क्यों फिर बताऊं? क्या क्या सहा जीवन मे अश्रुधारा क्यों फूटी है, मेरी सपनीली आंखों में? सुख बताऊं, दुख या बोलो कितने घाव दिखाऊँ? तुम ही कहो... कब तक दिखाऊँ, क्यों फिर दिखाऊँ? बढ़ रही तारीखें पर  खड़ी दोराहे अब भी तुम विमुख चल पड़े नई डगर अब भी अकेले तुम ही कहो.....  कब तक पुकारूँ, क्यों फिर पुकारूँ? चल सकती हूं मैं भी, दृढ़ संकल्पित भी हूं तुम न ठहरो, न पलटो  तुम तक पहुंच गई तो तुम ही कहो.... मैं कब तक पीछे चलूं, क्यों फिर पीछे चलूं? चलो "हमसफ़र"चलें, जब राहें एक और मंज़िल भी एक फिर तुम ही कहो.....  कब तक अकेली, क्यों फिरुं अकेली?      नीता झा

ये समय परिवार का - नीता झा

सुलभा ने साड़ी ठीक करते हुए आवाज़ लगाई जय-विजय पानी ज्यादा रखना नहीं तो पापा के सामने लड़ने लगोगे पिछली बार की तरह और चप्पल पहनती हुई बाहर आ गई उसके हाथ में नाशते का थैला था।      अपने गांव की सीमा में लगे प्लाट पर पहुंच कर तीनो ने बड़े आदर भाव से शहीद विनोद की प्रतिमा को प्रणाम किया और बड़े मनोयोग से प्रतिमा,चबूतरे और आस-पास की जगह को हंसी मजाक और नोक-झोंक करते हुए साफ करने के बाद विनोद की प्रतिमा के पास बैठ गए तीनो अपनी अपनी बातें, शिकायतें सारा कुछ  शेयर करते करते चार प्लेट नाश्ता निकल कर उसमें से एक प्लेट शहीद विनोद के सामने रखकर बड़े ही श्रद्धा भाव से नमन करके उसे तीनो प्लेट में बांट कर खाने बैठ गए।      एकबार कुछ लोग यहां की बातें फोटो वगैरह लेने सरपंच जी के यहां परमिशन लेने गए तो उन्होंने बड़े प्यार से समझाया - "आप बाकी किसी भी समय हमारे विनोद बाबू की फोटो ले लीजिए उनके पूरे गाँव की पर ये समय उनके परिवार का होता है तब हम क्या उनके परिवार के बाकी लोग तक वहां नहीं जाते ठीक वैसे ही जैसे रविवार को आप अपने परिवार के साथ अपना समय बिताते हैं।  सिर्फ और स...