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मंच को नमन करते हुए २६जनवरी के उपलक्ष्य में मेरी कविता सादर प्रेषित– नीता झा

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आ रहा है पर्व प्यारा.. शब्द मोती सजाने की आस लिए जा रही हूं.. आज मैं छंद में प्यारे प्यारे रस छंद.. प्यारी प्यारी भावना सुंदर सी रचना से.. आरती हूं करती मैं मेरी माता भारती को.. सोहे शेर ओजस्वी उनकी भी आरती.. कर रही आज मैं जल थल वायु भेदे.. मेरे भाई निर्भीक उनको भी नमन .. कर रही आज मैं देश चल सकता है.. अपने इरादों से ढेरों तंत्र ढेरों पार्टी.. लगी रही सेवा में रत्नों की कमी नहीं..  मेरी माँ के अंगों में सदियों से समृद्ध..  मेरी माँ भारती  कण कण अमृत..  पग पग हीरे मोती  जल थल नभ सब..  बहे ज्ञान चहुं ओर  वेद, उपवेद सोहे..  वाणी में सजे देवी  कल - कल, छल छल..  बहे नदी झूमती  सिंह जैसी सेना वीर..  बैरियों के सीने चिर  देख भाल करते हैं..   माँ के बेटे शूरवीर  नीता झा

नेताजी की पुण्य स्मृति – नीता झा।

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          नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी की पुण्य स्मृति अपने आप मे वंदनीय है। आपने अपनी सारी शक्ति, सारी ऊर्जा देश के लिए लगाई और हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गए।          भारत को स्वतंत्र करनेवाले असंख्य वीरों, वीरांगनाओं का अनन्त काल तक हर भारतिय नागरिक ऋणी रहेगा। जिस तरह हम कुछ भी करलें माता - पिता के ऋणी ही रहेंगे वैसे ही जिस भी काल मे जिस किसी ने भी किसी भी तरह की भारत माता की रक्षा की है देशभक्ति का काम किया है। वह सदैव वंदनीय रहेंगे।         हमे भी यह याद रखना चाहिए हम भी उसी भारत माता की संतान हैं तो अपने देश के प्रति हमारा भी कुछ फ़र्ज़ है जिसे निभाना अन्य दायित्वों की तरह ही आवश्यक है।          जिस तरह एक आदर्श परिवार में हर व्यक्ति की अपनी अहमियत और जिम्मेदारी होती जिसे वो सहज भाव से सम्पन्न करते हैं। वो भी अपने व्यक्तिगत कार्यों मनोरंजन इत्यादि अन्य गतिविधियों के साथ ठीक वैसे ही हर व्यक्ति को अपने जीवन काल मे अपनी समस्त जिम्मेदारियों के साथ साथ देश हित के कोई न कोई काम अवश्य करने...

कौड़ी - कौड़ी जोड़ने किए अनन्त उपाय – नीता झा

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  कौड़ी - कौड़ी जोड़ने... किए अनन्त उपाय।। जीवन झीना हो रहा... सेहत दिए भुलाए।। अपनी काया साथ चले... सांसें जब तक होए।।  फिर काहे तू इनसे विमुख... खुद को दिए विसराए।। आंधी- अंधड़ विपदा जीवन... योग पांव जमाए।। कोई विपदा ना हरा सके...  तन में शक्ति होए।।  उठें सबेरे सूरज से पहले...  तन मन खुशियां पाए।।  मन प्रफुल्लित, शरीर स्वस्थ...  जीवन सफल कहलाए।।  खान पान में नियम बरतें... सुपाच्य औषधि होय।।  देंह तंदुरुस्त होवे इससे...  रोग भागते जाएं।। मन चंचल हर समय कुछ न कुछ विचारों में उलझ रहता है। जीवन को सुखमय बनाना चाहते हैं तो इन्हें संयमित, संतुलित करना अत्यंत आवश्यक होता है।       कुछ नियम खुद के लिए भी बना के रखें हमे बचपन से घर मे भी बाहर भी अच्छी बातें सिखाई जाती हैं। सभी अपनो की कोशिश होती है हम अच्छे बने सभी के सतत प्रयासों बचपन से की हुई मेहनत, लगन के बाद ऐसा क्या होता है कि हम वो नहीं बन पाते जो बन सकते थे?      आपने यदि गौर किया होगा तो देखेंगे नन्हे बच्चे की शारीरिक संरचना बड़ी नाज़ुक, कोमल ह...

और सब ठीक हो गया – नीता झा

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कुछ शब्द जो पारे की तरह कानों में पड़ते हैं। जिन्हें सुनना, सहना आसान नहीं होता....  पर किया भी क्या जाए....  कितनो के मुह बन्द करें और किस किस बात पर.... माँ गुस्से में बड़बड़ाती रोटी सेंक रही थी पास ही बैठी लक्ष्मी बर्तन साफ कर रही थी।  क्या हुआ माँ क्यों दुखी हो रही हो? कुछ नहीं लाडो.... बताओ तो... बेटी की पुचकार सुन लाजो का मन भर आया उसने बड़े धीमे से स्वर में बताया-" आज मालकिन के घर साफ सफाई कर रही थी साहब का कोई जरूरी कागज कचरे में डाल दी थी। सब ढूंढ रहे थे जब मैं बताई कचरे में कागज भी था तो मेरेसे निकलवाए और साहब बहुत गुस्सा कर रहे थे। बोले बिना पूछे कोई सामान मत फेका कर वो बता रहे थे। दस हजार का था वो... लेकिन इतना महंगा दिख नहीं रह था... क्या पता क्या था वो भाभी के ऊपर भी बहुत गुस्सा कर रहे थे बोले -" लाजो के लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर है तुम तो देखा करो" मेरे कारण भाभी को भी बहुत सुनना पड़ा। बेटी भैया जो बोले उसका क्या मतलब है? लक्ष्मी ने मुस्कुरा कर अपनी माँ को गले लगाते हुए कहा- इसका मतलब है अब हम दोनों रोज रात में बैठेंगे तुम स्वेटर बनाना सीखाना मैं...

मैं भारत की स्त्री - नीता झा।

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मैं अंदर ही अंदर बढ़ रही हूं कभी सँवरती कभी बिखरती हूँ मैं भारत की स्त्री खुद ही खुद को गढ़ रही हूं... मैं अंदर ही अंदर बढ़ रही हूं.... घर तो कभी  खुद को सलीके से सँवारती कभी नया,अलबेला भी गढ़ रही हूं मैं अंदर ही अंदर बढ़ रही हूं.... भूली नही त्रासदी सदियों पुरानी भी इसलिए  बच्चों को देशभक्ति कहानियों  से सीखा रही हूं मैं अंदर ही अंदर बढ़ रही हूं.... गर्भस्थ या गोद मे,  देश भक्ति के काम लगे मेरी हरेक सन्तान हमेशा मुझसे ही तो बल पाती है मैं जो भी उन्हें सिखाऊँ मनोयोग से सीखती है... इसी आशा के चलते अच्छाई के उत्तुंग शिखर  अपनी आमद का  परचम लहरा रही हूं.... मैं आजाद देश की आजाद स्त्री आजादी के सही मायने दुनिया को बता रही हूं.... मैं भारत की स्त्री अंदर ही अंदर  बढ़ रही हूं..... कभी निखरती कभी बिखरती खुद से खुद को  गढ़ रही हूं.....        नीता झा

तलाक़ क्या होता है - नीता झा

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तलाक़ क्या होता है? पूछो बूढ़ी दादी से .... जिन्होंने मौत को मात दी थी तुम्हारी शादी की बात सुन तलाक़ क्या होता है? पूछो उन उदास जोड़ों से.... जिन्होंने दुनिया से बैर लिया अपने बच्चों की खातिर आज भी लड़ रहे हैं खुद से,दुनिया से और अपने टूटते अधेड़ सपनो से।। तलाक़ क्या होता है? पूछो उन अबोध रिश्तों से  जो तुम्हे आदर्श समझते तुम्हारी पीड़ा देख कर विवाह को ग़लत समझते हैं तलाक़ क्या होता है? उस बहन से पूछो... जो रोज़ सुनती है बात बे बात उलाहने साबित करना होता है जूझते रोज ही खुद को  तलाक क्या होता है? पूछो उन दो जोड़ी आंखों से जो तुम्हारी रोज़, रोज़ की फ़ूहड़ लड़ाई देखती हैं चुपचाप तुम्हारे कठोर उद्दंड आदेश को न मान दोनों हथेलियों से ख़ुद को पूरी ताक़त से दबती हैं इतना कि दर्द से आंसू निकले जब तुम बहुत उदास और अवसाद से भरे उसके पास आकर सोने के नाम पर पलकें भिगोते हो तभी वो नन्हे हाथ डरते सहमते तुम्हारे आए आंसू पोंछते हैं क्रोधवश पड़ी अकारण  मार से खुद को बचाते हैं तलाक़ क्या होता है? पूछो उस नन्ही ज़बान से  जिसे वयस्क ,अबोध फिक्रमंद, चालक,निर्णायक,विदूषकऔर  धूर्त सवालों के जव...

कितना आसान था कहना नीता झा

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कितना आसान था कहना... भूल जाओ,रात गई बात गई कितना मुश्किल है सम्हालना... मन के उस कोने को समझाना जो सतरंगी सपने सजाता आया... बरसों बरस,झूमता रहा उत्सव से गाता रहा  गीत तुम्हारे प्यार के... कैसे मनाऊं उस नादान को कहो छला जाता रहा था हर उस पल... जब दुआएं कर रही होती थी मैं तुम्हारी लम्बी उम्र की और तभी... किसी और के मोहपाश में तुम खिलखिलाते गुनगुनाते होते थे... कैसे सहन करूँ मैं तुम ही कहो मांग में ही बसे रहे तुम सदा मेरी... तुम पर मेरा कभी न कोई हक था सब जान भी मैं क्यों  इतनी बेबस...  क्या है जो रोक ही लेता है हर बार ।। क्या बहुत से अपने रिश्तों का ख्याल... या दुनियां के उठते अनगिनत सवाल।। नहीं पता पर तुम नहीं समझोगे कभी... जीते हुए पति की विधवा ख्वाहिशें।। सिंगार करना सुहाता ही नहीं और... अपनो से कह पाना आसान नही।। इसी लिए फेंकी नहीं वो चूड़ियां ... रखीं सन्दूक में छुपा ताले में बंद ।। वो याद दिलाती थीं प्यार तुम्हारा, वो याद दिलाती थीं समर्पण मेरा।। वो सिर्फ झूठा भ्रम ही तो था मेरा... सब छोड़ आई जिस साजन के लिए।। मेरा वजूद कुछ नहीं उनकी नज़रों में... मैं समाज म...