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झूम उठी तब धरती माता - नीता झा

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विचर रहे सावन में शिव - शिवा.. धरती माँ के हर इक कोने पर।। स्वागत को आतुर माँ प्रफुल्लित.. रिमझिम झड़ी में स्नान कर फिर।। विविध रंगों के फल, फूल सजाए.. हरित सुगंधित, परिधान सुसज्जित ।। भक्ति भाव से अगवानी करती माँ.. अपने आराध्य का ध्यान लगाती।।      सावन यानी सात्विकता का मौसम है। सावन के आते ही त्योहारों की शुरुआत हो जाती है। सावन सोमवार को महादेव पार्वती की आराधना का दिन होता है। पार्वतीमाता स्वयं प्रकृति हैं। सम्पूर्ण जगत वही हैं। और महादेव विनाश के स्वामी सही भी है। जब भी प्रकृति को रूष्ट किया बाढ़ आई, बादल फटे, भूस्खलन हुआ कभी भूकम्प आया और हम सब संतुलित रहा तो चहुं ओर सावन में उत्सव ही उत्सव मने। जिन पांच तत्वों से प्रकृति का निर्माण हुआ है उन्ही पंच तत्वों से हम भी बने हैं तो सामान्य सी बात है जो नियम प्रकृति के लिए बने हैं। सारे हमारे लिए भी तो हैं। जितना नियमित जीवन होगा उतना जीवन आनन्दमय होगा।       सावन के  मौसम में अपने आहार - विहार पर सम्पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए। साफ - सफाई का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। बरसात में संक्रमण बढ़...

शिक्षा, शिक्षक और हम - नीता झा

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  मात पिता, गुरु को  वंदन..  जिनसे शिक्षा मिली प्रथम।।  अस्तित्व में आने से पहले..  अपार स्नेह है मिला प्रथम।।    जब भी गुरु की महिमा होती है। सर्वप्रथम अपने अम्मा-पिताजी और बड़े भाइयों का ध्यान आता है। उनसे वो भी सीखा जो प्रत्यक्ष सिखाया बहुत सी महत्वपूर्ण सीख ऐसी भी मिली जो अनुसरण कर मैने स्वयं उनसे सीखा।    फिर जब स्कूल गई अलग - अलग शिक्षक - शिक्षिकाओं से वर्षों विभिन्न विषयों का ज्ञान मिला सबकी अलग - पहचान,सबकी अलग सोच, पढ़ाने की भिन्नताएं फिर बदलती कक्षाओं में मिलते नए - पुराने सहपाठियों के साथ पढ़ने के अनुभव भी तो कुछ कुछ अलग ही होते हैं।     मैने महसूस किया है। शिक्षा की उपयोगिता इंसान का निर्धारण करती है और इंसान की उपयोगिता शिक्षा निर्धारित करती है।    आपने क्या, कहां और कितना सीखा ये महत्वपूर्ण तो है किंतु अपने अर्जित ज्ञान से आपने क्या किया ज्यादा महत्वपूर्ण है।     शिक्षा तो वही उत्तम है जो शालीन बनाए, विवेकी बनाए, समाज, देश, दुनिया के लिए कुछ अच्छा करने प्रेरित करे। विनाश के लिए ग्...

गुरुपूर्णिमा पर गुरुदेव को नमन - नीता झा

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    गुरु की महत्ता को नमन करने का पर्व गुरु पूर्णिमा,इस पावन पर्व में सभी गुरुजनो को नमन...  मनुष्य में जन्मजात प्रवृति होती है;अपने आस पास के परिवेश को देख, सुन,महसूस करके सिखने की। नवजात शिशु पढ़ना, लिखना,बोलना नही जानता किन्तु जन्म से ही सिखने की सतत प्रक्रिया मृत्यु पर्यन्त चलती ही रहती है।     जब हमे यह समझ आने लगता है कि हमारी शिक्षा का कोई नाम मिलने लगा है; तो हम वहां से अपनी शिक्षा की गणना करने लगते हैं। जबकि गुरु तो प्रकृति भी है। जड़ , चेतन, दृश्य,अदृश्य ,छोटे,बड़े,अपने,पराए जिनसे भी हम कुछ भी सीखते समझते हैं वही तो गुरु है ।       हम जीवन के अलग- अलग पड़ावों में कुछ न कुछ सीखते ही रहते हैं अब हमपर निर्भर करता है; हम किससे और क्या सीख रहे हैं । जो हम सीखते हैं समाज देश और हमारे परिवेश पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है। अर्थात सीधे शब्दों में कहें तो हम अपशब्द सीख रहे हैं अथवा भजन हमपर निर्भर करता है ।      विभिन्न समय व परिस्थितियों में हमारे ग्रहण किए हुए ज्ञान के मतलब भी बदल जाते हैं। दोनों ही अर्थ सही होते हैं जैसे हम...

मांडूक्य ऋषि की तपोभूमि मदकूद्वीप - नीता झा

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 सभी विवाहित जोड़ों की तरह हम शुरू से ही अपनी सालगिरह में कहीं घूमने जाते हैं। प्रायः बिना कुछ प्लान किये कुछ जरूरी सामान लिया, कार की टँकी फूल की फिर पूजा के बाद हल्का नाश्ता करके किसी मनपसन्द रेस्टोरेंट में कुछ खाया कुछ सूखा नाश्ता, मिठाई इत्यादि बच्चों और हमारी  मन पसन्द खाने की पर्याप्त सामग्री ले कर निकल पड़ते जहां मन किया, जब तक मन किया घूम फिर के एक दो दिन में वापस अपने घर नई ऊर्जा नई सोच के साथ बच्चों के अगले सत्र की पढ़ाई और अपने दायित्वों के सम्पादन में जुट जाने को.....  अब बच्चे बड़े हो गए हमारी शादी भी जीवन के अनुभवों के साथ  परिपक्व हो गई किन्तु हम अपनी वैवाहिक वर्षगांठ अब भी वैसे ही मनाना पसन्द करते हैं।        इसबार हम छत्तीसगढ़ के मदकूद्वीप गए थे। इससे पहले हमलोगों ने इस जगह का नाम कभी नहीं सुना था। फिर गाड़ी में ही नेट में सर्च करने पर वहां का बड़ा ही चौकाने वाला गौरवशाली इतिहास दिखा हम हरियाली भरे वातावरण से होते हुए जब वहां पहुंचे बड़ी मनोरम जगह थी वो शांत, सुंदर प्रकृति का सुंदर सात्विक स्वरूप.....  हम वहां...

ये रिश्ते - नीता झा

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बड़े जतन और प्यार से... गुंथी है माला प्यार की।। न बिखरे इसे ध्यान दो… मिलकर इसे सम्हाल लो।। हर मोती हैं बेशकीमती... छुटकी हो या लाल हो।। बिखर गए तो क्या करोगे... सारे तुम्हारे जान से प्यारे।। जोड़ लो बढ़कर फिर से... अपने रिश्तों के मनके।। सुलझाना ही तो है बस... सुलझ जाएगा सारा कुछ।। बस इत्मीनान से वक्त देदो... कुछ जो ठीक नहीं खुद में।। कुछ मीत की कमियों पर... घुलमिल कर तुम काम करो।।  बड़े जतन से फिर हौले हौले... दोनों अन्तस् पर ध्यान धरो।। बनाओ प्रीत की फिर से डोर... बड़े जतन और प्यार से।। गंथो हीर माला दोनों प्यार की... कभी न बिखरे ध्यान दो।। जी हाँ वो प्यार भरा रिश्ता, वो कसमो भरी बातें, मुलाकातें वो कभी न बिछड़ने का प्रयास कैसे धीरे - धीरे अपना स्वरूप बदलने लगता है । समय पर ध्यान न दें तो कोई नितांत अपना हमसे दूर होने लगता है। सम्बन्ध चाहे कोई भी हो, रिश्ता चाहे जितना भी निकट का हो जब बना है तो एक मजबूत ढांचा तो होगा ही फिर पति - पत्नी का रिश्ता तो सबसे मजबूत भी और सबसे नाजुक रिश्ता होता है।इस रिश्ते को बाहरी नमी से बचाइए यानी अपने अंतरंग रिश्ते में बाहरी लोगों को अनावश्...

योगाभ्यास और स्वास्थ्य - नीता झा

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  "खेल - कूद से शक्ति मिले, योग भगाए रोग" श्रेष्ठ कर्म युक्त जीवन मिले, जब काया रहे निरोग"।       हमारी प्राचीन स्वास्थ्यगत विधाओं में योग एवं खेलों का  विशेष महत्व रहा है। ऊर्जावान स्वस्थ जीवन की आधारशिला ही योग एवं खेलकूद हैं।        खेल और योग को यदि बचपन से बच्चों के जीवन में सम्मिलित किया जाए तो उनके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होता है। जिससे उनपर उचित प्रभाव पड़ता है।        गुनगुने जल का उखड़ू बैठ कर सेवन करने के पश्चात शौचादि से निवृत हो कर खाली पेट रह कर , प्रातःकाल किया गया  योगाभ्यास तथा विभिन्न खेलों का अभ्यास अभ्यासियों को श्रेष्ठ परिणाम दायक होता है।   देखा गया है कि ऐसे बच्चे बचपन से ही अनुशासित, ऊर्जावान, कर्मठ, फुर्तीले और आशावादी होते हैं जिससे वे जीवन मे आने वाली परेशानियों तथा चुनोतियों का सहजता से सामना करते हैं।         योग तथा खेलों का प्रशिक्षण कुशल प्रशिक्षक की देख - रेख में होना चाहिए जिससे बच्चे की आयु, शारीरिक क्षमता, के साथ ही उचित, अनुचित आहार - विहार ...

रिश्तों की डोर - नीता झा।

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रिश्तों की डोर उलझने लगे.. अपना ही साया दूर होने लगे।। रुको जरा सा विश्राम करो.. फिर मनोयोग से सुलझाओ।। कुछ सलवटें ही तो हैं कुछ.. गांठें ही तो हैं ठीक होंगी।। रिश्ते में तकलीफ ही नहीं.. बेशुमार हंसी पल भी गुजारे।। उन्हें वापस जीवन मे लाओ.. ज़िन्दगी फिर खुशनुमा होगी।। प्रायः हमारे आसपास अपने से रिश्ते टूटने - चटखने की मनोदशा में दिखते हैं। उन सभी अपनो को बिखरते देखना बड़ा पीड़ादायक होता है। जब हम उन्हें महसूस करके इतने उदास हो जाते हैं तो उनकी तकलीफों का सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है।     हर रिश्ते की बनावट ठीक आंखों की तरह  एक सी मालूम पड़ती हुई किंतु सर्वथा भिन्न होती है। ऐसे में सभी को अपने अपनों को समझने के लिए पूर्वाग्रहों से मुक्त होना पड़ेगा सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए अपने दाम्पत्य जीवन का ईमानदारी से स्वयं निरीक्षण करके जहां भी किसी भी तरह की कमी है या जहां अधिकता है। उन सभी भावनाओं, कर्तव्यबोध, आर्थिक, शारीरिक अथवा मानसिक स्थितियों में संतुलन बनाने पर ध्यान देना चाहिए।    अपने साथी का चयन पूरी दुनियां से चुन कर आपने और आपके अपनो ने किया है। त...