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मार्च, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

होली - नीता झा

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सात रंग की होली आई.. कुछ सहमी दादी घबराई।। दौड़ दौड़ बच्चों को खिंचे.. दिन भर उसके पीछे भागे।। कभी लपक हाथों को धोती.. कभी जबरन मास्क लगाती।। रंग - गुलाल न पिचकारी.. आई देखो कैसी महामारी।। पर बच्चे तो ठहरे बच्चे.. हर आफत से बच जाते।। जब भी नज़र उनसे हटती.. कुछ शैतानी उनको सूझती।। रंगों का त्योहार है.... नन्हे बच्चों की हैं छुट्टियां.... कुछ धमाचौकड़ी, कुछ शरारत.... बस सब हो सुरक्षित हदों के भीतर... आप सभी को होली की बहुत बहुत बधाई.... नीता झा

तुम ही हो - नीता झा।

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मेरी मेहंदी, मेरी चूड़ी, मेरी बिंदिया तुम ही हो... मेरे सारे कहकहे और मेरे सपने तुम ही हो।। मेरे प्रियतम, मेरे राजा मेरी शान भी तुम ही हो... मेरे सारे रिश्ते नाते उनकी मर्यादा तुम ही हो।। मेरे साजन मेरे सारे जीवन की परिभाषा तुम हो... मेरी अल्हड़ उम्र के पहले मीत तुम ही तो हो।। जो जीता खुशियों में मेरी वह भरोसा तुम ही हो... सात वचन से बांधा बाबा ने जिससे तुम ही हो।। मान रखे जो वचनों का वो विश्वास भी तुम ही हो... मेरे बच्चों के पोषक, प्रथम शिक्षक तुम ही हो।। उनके अनगढ़ मानस को जो गढ़े वो तुम ही हो... खुशियों को जो कृतसंकल्पित वो तुम ही हो।। जिसके लिए किए सोलह श्रंगार वो तुम ही तो हो... नीता झा

पीढ़ियां गुज़र जाएँ तो क्या.....नीता झा

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पीढियां गुज़र जाए तो क्या इतिहास के पन्नो में... जज़्बातों को संजोए रखना बहुत जरूरी होता है।। सदियों की मेहनत से रचे इतिहास के पन्नो संग... हाथों के छाले दिखाना बहुत जरूरी होता है।। जाने कब कोई कहने लगे कुछ भी अनापशनाप... हमेशा पुरखों की इज्जत करना जरूरी होता है।। जो थे अपरिचित हमे दे गए बेशक़ीमती इतिहास... उनके बलिदानो पर श्रद्धा रखना जरूरी होता है।। गहरे रहस्यों की अंधियारी अज्ञानता की कोठरी... कैसे कैसे जगमगाई जानना बहुत जरूरी होता है।। चाबियां होती हैं छिपी हर मुश्किल घड़ियों की... हर दौर में ग्रन्थों का पाठन बहुत जरूरी होता है।। नीता झा

शहादत - नीता झा

समय के हृदय में बसने वाले... जान की बाज़ी लगा कर भी!! देश को आज़ादी दिलाने वाले... विचरते भी होंगे कभी वतन में!! करते होंगे नमन माँ भारती को... देखते होंगे जब कभी ठहर कर!! पूछते  तो होंगे हाल माँ से भी... कटती, लुटती मां की परिधि पर!! घटते उसके आँचल के छोरों पर... क्रोधित अत्यधिक फिर होते होंगे!! खुद के नही और हमारे होने पर... शायद उदास और क्रोधित होंगे!! अनगिनत कुर्बानी से ही हमको... आज़ादी भरा ये देश मिला है!! जीने, खाने, समय बिताने को...  माँ भारती का आँचल मिला है!! तीनो शहीदों की शहादत ने ... जोश आज़ादी का फूंका था!! उनकी ओजस्वी बातों से फिर... अंग्रेजों का सारा हौसला टूटा था!! चढा दिया फांसी पर युवाओं को... सबका हौसला खत्म करने को!! पर तमाम शहीदों की शहादत का... यह परिणाम फिर निकला था!! हर घर भगत, सुखदेव, राजगुरु... सरीखा जवान युद्ध मे कूदा था!! नीता झा
क दस्तावेज भविष्य के नाम     आप सभी को सादर अभिवादन करते हुए अपने मन मे उठे विचार व्यक्त करना चाहती हूं। आशा है आपलोगों की प्रतिक्रिया मिलेगी।      सत्तर, अस्सी के दशक में अभी की तरह सशक्त संचार माध्यमों का अभाव सा था।    कभी कभी आवश्यकता बड़े सुदृढ नियम बना लेती है। हमे पता भी नहीं चलता ऐसी ही एक परंपरा सी थी। इलाहाबाद जाना मतलब काली मछली का झंडा गोपाल पंडा जी के पास जरूरजाते थे और  सभी नए बच्चों के नाम वंशवृक्ष में अंकित करवाते थे यह बड़ा महत्वपूर्ण काम होता था। जो आज भी बदस्तूर चला आ रहा है। हमे हमारी जड़ों से जोड़ती व्यवस्था है ये।         मैने अपने किशोरावस्था में पहली बार उस वक्त इस विषय पर ध्यान दिया जब हमारे रिश्ते में कहीं शोक हुआ था। हमेशा की तरह तब भी कुछ बच्चों के नाम गए थे। हमारे घर से भी भतीजे का नाम लिखवाया गया था। वह उम्र में मुझसे बहुत छोटा नहीं है। जाहिर है हम बुआ भतीजे से ज्यादा भाई बहन की तरह रहते थे।     खैर वंशवृक्ष बनकर आई पिताजी के साथ सबलोग बैठ गए अपना अपना नाम देखने चार भाइयों की अकेली बहन यानी ह...
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दूर के आती आवाज़ें समझ मे तो नहीं आ रही थीं। लेकिन हां, ये समझ मे आ रहा था ये केवल महिलाओं और बालिकाओं की पतली पर दृढ़ता लिए आवाज़ थी। एक पल को मन किसी आशंका की सोच घबराया वह डर गई घूंघट सम्हालती हुई अपनी कुपोषित दुधमुंही बेटी  को बगल में दबाए आंगन के कोने की दीवार से सटकर खड़ी हो गई।           बाहर दूसरे किनारे पर माँ बाबूजी लोग तख्त में बैठे बतिया रहे थे। अनायास ही उनलोगों का ध्यान भी उस मद्धम से तेज होती आवाज की तरफ गया गांव की मुख्य सड़क से बहुत सी महिलाएं हाथों में झंडे लिए इसी तरफ आ रही थीं आस पास के सभी घरों से लोग कौतूहलता वश बाहर निकलने लगे थे।       अचानक बाबूजी की नजर अपनी बहू पर पड़ी वो बिफर ये बाहर क्या कर रही है?      भेजो इसको अंदर अपने घर से सिख के नहीं आई तो क्या तुम नहीं सीखा सकतीं?      उनके आग्नेय नेत्रों को देख माँ भी सहम गईं       वो अंदर जाने को मुड़ ही रही थी कि दूर से पदमनी हाथ हिलती हुई चिल्लाई काकी,भौजी जल्दी बाहर आओ महिला दिवस की रैली है.....   ...

मैं और मेरी मजबूरियां - नीता झा

लहरों सी अनगिनत मजबूरियां अनवरत बहाने को आतुर बढ़ती मेरे वजूद को छलनी करती मुझसे सैकड़ों समझौते कराती और मैं पानी को थामती ,सम्हालती नन्ही शैवाल सी डोल रही हूं अपने आपको लहरों से भिड़ाती, लड़खड़ाती ,बलखाती  किसी तरह जमी हुई हूं               नीता झा

जीवित तेरी काया लचीली – नीता झा

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हरि - भरी मौसमों की सखी.. नन्ही-नन्ही लतिकाओं वाली।। कहीं कोमल तंतुओं से थामें.. कहीं शाल्मली सीधी सरल।। बरगद की विशाल शाखाएं.. कहीं बांस, बेत की लचक।। कहीं चंदन की मीठी महक.. कहीं भूख मिटाती पालक।। इंद्रधनुषी रंगों से लदी-झुकी.. कहीं बन गई वन की शोभा।। पीली केसरी अग्निशिखा.. मूल रूप में बसती लकड़ी।। खाल की चादर ओढ़े टहनी.. जड़ें भूमिगत नींव का पत्थर।। सुख गई, कटी बिखर गई.. और बेशकीमती मूर्ति बनगई।। लकड़ी तु ही चढ़ी मंदिरों में.. घर बाहर हर जगह सज गई।। पर लगती सबसे प्यारी जब.. जीवित तेरी काया लचकती।। नीता झा